दिल्ली के जंतर-मंतर में CJP के प्रोटेस्ट में पहुंचे कुछ युवाओं ने एक टी-शर्ट पहनी, जिस पर लिखा था- ‘ना मर्दों के प्रदेश मध्य प्रदेश से भी आए हैं मर्द।’ कुछ यूट्यूबर्स ने इनका इंटरव्यू लिया और वीडियो पूरे देश में वायरल हो गया। इसके साथ ही प्रदेश में हुए पटवारी घोटाले से लेकर सिरप कांड तक कई मुद्दे फिर चर्चा में आ गए।
NEET-UG और NET जैसे पेपर लीक के खिलाफ देशभर के छात्र कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के बैनर तले संसद चलो आंदोलन कर रहे हैं। इसी आंदोलन में हिस्सा लेने मध्य प्रदेश के कुछ छात्र भी दिल्ली पहुंचे और वहीं यह विवादित टी-शर्ट पहनी। यूट्यूबर्स ने उनका इंटरव्यू लिया और यह वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हो गया।
वीडियो में युवाओं ने एक सांस में कई मुद्दे गिनवा दिए। उन्होंने भागीरथपुरा कांड का हवाला दिया, जहां दूषित पानी से कई मौतें हुई थीं, और खजराना के उस अस्पताल का जिक्र किया जो सालों से बिना बिल्डिंग और बिना हिसाब-किताब के कागजों पर चल रहा है। इसके साथ ही छिंदवाड़ा कफ-सिरप कांड, जिसमें कई बच्चों की मौत हुई थी।
सवाल 2: क्या यह नारा मध्य प्रदेश का अपमान था?
जवाब- टी-शर्ट पहनने वाले युवाओं में शामिल पवन अहिरवार से हमनें बात की तो उनका कहना है कि यह राज्य का अपमान नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के युवाओं की चुप्पी पर व्यंग्य है।पवन का कहना है कि यूपी या बिहार में परीक्षा में छोटी सी धांधली होने पर भी छात्र सड़कों पर उतर आते हैं और सरकार को फैसले बदलने पड़ते हैं। लेकिन मध्य प्रदेश में व्यापमं और पटवारी जैसे महाघोटाले होने के बावजूद युवा चुपचाप घरों में बैठा रहता है।पवन ने बताया- नामर्द शब्द का इस्तेमाल किसी को नीचा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि युवाओं को उकसाने के लिए किया गया, ताकि वे अपने हक के लिए सड़कों पर उतरने की हिम्मत जुटा सकें।राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई कहते हैं- इंकलाब जिंदाबाद जैसे नारे भी अगर शब्दशः लिए जाएं तो हिंसक क्रांति की मांग जैसे लगते हैं, जबकि उनका मकसद कभी वह नहीं रहा। तमाम राजनैतिक दल समय-समय पर ऐसी तीखी भाषा का इस्तेमाल करते आए हैं। उनका तर्क है कि जब देश के बड़े नेता खुद एक-दूसरे के लिए अपमानजनक भाषा से परहेज नहीं करते, तो छात्रों की एक टी-शर्ट पर उंगली उठाना बेमानी है।

सवाल 3: NEET के प्रदर्शन में पटवारी घोटाले का जिक्र क्यों?जवाब- ये युवा पहले से ही NEET और NET पेपर लीक के खिलाफ चल रहे इंदौर के प्रदर्शन में शामिल थे।युवाओं का कहना था कि परीक्षा में गड़बड़ी सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश में भी हुई है। इसी वजह से उन्होंने प्रदेश के चर्चित पटवारी भर्ती घोटाले का जिक्र किया। उनका मकसद यह बताना था कि युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ का पैटर्न सिर्फ केंद्र की परीक्षाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्य की भर्तियों में भी ऐसे आरोप लग चुके हैं।
मध्य प्रदेश कर्मचारी चयन मंडल (MPESB) ने मार्च-अप्रैल 2023 में पटवारी भर्ती परीक्षा कराई थी, नतीजे 30 जून 2023 को आए। नतीजों के कुछ ही दिन बाद जुलाई 2023 में बड़े पैमाने पर धांधली के आरोप लगे- मेरिट लिस्ट के टॉप 10 में से 7 उम्मीदवार ग्वालियर के एक ही परीक्षा केंद्र से थे, जो एक तत्कालीन भाजपा विधायक का कॉलेज था।परीक्षा के टॉपर मीडिया के सामने यह भी नहीं बता पाए कि मध्य प्रदेश में कुल कितने जिले हैं, और कई के हिंदी में हस्ताक्षर होने के बावजूद अंग्रेजी में पूरे अंक थे।
मुरैना जिले के एक ही सरनेम (त्यागी) वाले 23 उम्मीदवार भी चुने गए, जिनमें से कई संदिग्ध रूप से दिव्यांग कोटे से थे। विपक्ष ने इसे ‘व्यापमं 2.0’ नाम दिया।दबाव में शिवराज सरकार ने 19 जुलाई 2023 को नियुक्तियां रोक दी थीं और जांच आयोग बनाया था। इस बीच दिसंबर 2023 में प्रदेश में सरकार बदल गई, और आयोग की रिपोर्ट पर क्लीन चिट मिलने के बाद फरवरी 2024 में मोहन यादव सरकार ने नियुक्तियों का रास्ता साफ कर दिया। लेकिन छात्र संगठन आज भी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने और निष्पक्ष जांच की मांग पर अड़े हैं।
सवाल 4: भागीरथपुरा और सिरप कांड जैसे मामलों को उठाने का क्या मकसद था?
जवाब- प्रोटेस्ट में मौजूद युवाओं ने अपनी बात को सिर्फ पेपर लीक तक सीमित मुद्दा नहीं रहने दिया, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही के एक बड़े पैटर्न के तौर पर पेश करने के लिए राज्य के दूसरे हालिया हादसों का भी हवाला दिया। ताकि यह दिखाया जा सके कि आम लोगों की जान-माल से जुड़ी लापरवाही बार-बार होती है, फिर भी जवाबदेही कभी तय नहीं होती।
इंदौर में दूषित पानी से 36 मौतें: पिछले साल दिसंबर में इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से 36 लोगों की मौत हो गई थी। इनमें से 35 शवों का बिना पोस्टमॉर्टम अंतिम संस्कार कर दिया गया- सिर्फ एक शख्स का पोस्टमॉर्टम हुआ, और उसमें भी मौत का कारण खाली छोड़ दिया गया। हाईकोर्ट ने जनवरी में रिटायर्ड जस्टिस सुशील गुप्ता की अध्यक्षता में जांच समिति बनाई थी, पर महीनों बाद भी रिपोर्ट नहीं आई। युवा इसमें फास्ट-ट्रैक न्याय की मांग कर रहे हैं।
छिंदवाड़ा में सिरप से 26 बच्चों की मौत: छिंदवाड़ा में कोल्ड्रिफ कफ सिरप से 26 बच्चों की मौत हो गई थी। दबाव के बाद पुलिस ने कंपनी मालिक एस. रंगनाथन को गिरफ्तार किया, पर युवाओं की मांग है कि जिन अधिकारियों की मॉनिटरिंग के अभाव में यह सिरप बाजार तक पहुंचा, उन पर भी हत्या का मुकदमा दर्ज हो।राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई का कहना है कि दूषित पानी या जहरीले सिरप से मासूमों की जान जाना बेहद दहला देने वाला है, लेकिन सरकार और प्रशासन में जवाबदेही लगभग खत्म हो चुकी है।

सवाल 5: जिस हवा-हवाई अस्पताल का जिक्र हुआ, उसकी कहानी क्या है?
जवाब- इन दो मामलों के अलावा युवाओं ने जिस तीसरे मुद्दे का जिक्र किया, वह था खजराना का वह अस्पताल जो सालों से सिर्फ कागजों पर मौजूद है।इंदौर के खजराना में प्रस्तावित 100 बेड के सिविल अस्पताल की घोषणा सरकार ने करीब 6 साल पहले की थी। लेकिन आज तक अस्पताल की इमारत तो दूर, उसके लिए जमीन का कब्जा भी नहीं मिल पाया। यानी अस्पताल आज भी सिर्फ सरकारी फाइलों में मौजूद है।दिलचस्प बात यह है कि अस्पताल बना नहीं, लेकिन उसके लिए 87 पद पहले ही स्वीकृत कर दिए गए। डॉक्टर, नर्स और पैरामेडिकल स्टाफ समेत करीब 80 कर्मचारी इसी अस्पताल के नाम पर नियुक्त हैं।
फिलहाल ये कर्मचारी पीसी सेठी अस्पताल, हुकुमचंद अस्पताल और संजीवनी क्लीनिकों में काम कर रहे हैं।सरकार का कहना है कि यह परियोजना पुराने अर्बन पीएचसी को अपग्रेड करने की योजना का हिस्सा थी, लेकिन जमीन नहीं मिलने से निर्माण शुरू नहीं हो सका। वहीं कांग्रेस के पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने इसे प्रशासनिक लापरवाही बताते हुए पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग की है।
सवाल 6: क्या विवादित स्लोगन लिखी टी-शर्ट पहनना पब्लिसिटी स्टंट था?
जवाब- पवन अहिरवार का कहना है कि यह कोई पब्लिसिटी स्टंट नहीं था। वे कहते हैं कि इंदौर में शायद ही कोई ऐसा मुद्दा हो जिस पर वे पहले सड़क पर न उतरे हों- MY अस्पताल की लापरवाही से लेकर बावड़ी हादसे तक, स्कॉलरशिप और बस पास के पैसे बढ़ने तक।राजनीतिक विश्लेषक रवि ठाकुर का मानना है कि सिर्फ NEET को लेकर हो रहे प्रोटेस्ट में भागीरथपुरा और सिरप कांड जैसे मुद्दे उठाने की कोई जरूरत नहीं थी। उनके मुताबिक, यह जानबूझकर कैमरे और लोगों का ध्यान खींचने के लिए उठाया गया एक उकसाने वाला कदम था,
जिसका मकसद बहस से ज्यादा सिर्फ लाइमलाइट पाना था।रशीद किदवई के मुताबिक, सोशल मीडिया के दौर में विरोध जताने का कोई तय तरीका या मर्यादा नहीं बची है। ध्यान खींचने के लिए भड़काऊ नारे अब आम रणनीति बन गए हैं। लेकिन वे सिर्फ इन युवाओं को दोषी नहीं मानते। उनका कहना है कि संस्कार बड़ों से आते हैं, और जब शीर्ष स्तर के राजनेता खुद मर्यादा तोड़कर एक-दूसरे के प्रति विचलित कर देने वाली भाषा बोलते हैं, तो युवाओं से संयम की उम्मीद रखना भी मुश्किल है।

सोशल मीडिया में कई पोस्ट नजर आए जिसमें युवाओं ने विवादित स्लोगन लिखी टी-शर्ट पहनी हुई है।