यह कहना है इंदौर के होम्योपैथिक डॉक्टर कपिल दीक्षित का। मामला छावनी क्षेत्र में सड़क चौड़ीकरण का है। यहां 22 मई को हुई नगर निगम की कार्रवाई का दर्द अब केवल टूटे मकानों और बिखरे सामान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक परिवार को ऐसा जख्म दे गया जो शायद जिंदगी भर नहीं भर पाएगा।
डॉ. कपिल दीक्षित को ब्रेन सर्जरी कराना पड़ी
तोड़-फोड़ के दौरान डॉ. दीक्षित गंभीर रूप से घायल हो गए थे। उनके सिर में इतनी गंभीर चोट आई कि तत्काल ब्रेन सर्जरी कराना पड़ी। कई दिनों तक वे अस्पताल में भर्ती रहे। आखिरकार 27 मई को उन्हें डिस्चार्ज कर दिया गया।

गनीमत रही बुजुर्ग पिता कमरे में नहीं थे
डॉ. कपिल दीक्षित ने बताया कि हादसा केवल यहीं तक सीमित नहीं था। कार्रवाई के दौरान बिना किसी पूर्व चेतावनी के मशीन से उनके मकान की पहली मंजिल की दीवार पर भी प्रहार कर दिया गया। इससे कमरे की दीवार टूट गई और एयर कंडीशनर, बिस्तर सहित अन्य सामान नीचे आ गिरा। उस समय उनके पिता बुजुर्ग पिता कमरे में मौजूद नहीं थे, वरना बड़ी घटना हो सकती थी।
24 घंटे की चेतावनी का नोटिस अचानक दिया
डॉ. दीक्षित ने बताया कि 12 मई को नगर निगम और पुलिस अधिकारियों ने क्षेत्र का दौरा किया था। उस दौरान चरणबद्ध तरीके से ट्रैफिक रोक कर लोगों को स्वयं निर्माण हटाने का समय देने की योजना पर चर्चा हुई। हालांकि, यह कभी लागू ही नहीं हुआ। इसके विपरीत 20 मई की शाम अचानक 24 घंटे का नोटिस देकर कार्रवाई की चेतावनी दे दी गई।
देखिए कार्रवाई की तस्वीरें…

छावनी इलाके में कार्रवाई करती नगर निगम की टीम।

जेसीबी के पंजे में बिजली के तार उलझ गए थे।

मलबा उखड़कर डॉक्टर के सिर पर आ लगा, जिससे वे घायल हो गए।

खुद हटा रहे थे निर्माण, फिर भी कार्रवाई
डॉ. दीक्षित के अनुसार, 21 मई को कुछ लोगों ने स्वयं बचा हुआ निर्माण हटाने के लिए सड़क पर अस्थायी रूप से यातायात रोका, लेकिन पुलिस अधिकारियों ने यह कहते हुए कार्रवाई रुकवा दी कि उन्हें इसकी कोई सूचना नहीं है। इसके अगले दिन भारी पुलिस बल, पोकलेन और जेसीबी मशीनों के साथ बड़ी कार्रवाई शुरू कर दी गई।
लोगों की जान जोखिम में डालना जरूरी था?
डॉक्टर दीक्षित का कहना है कि रहवासी भी निगम और प्रशासन से कई सवाल पूछ रहे हैं कि जब लोग स्वयं सहयोग करने और निर्माण हटाने के लिए तैयार थे तो इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई गई? क्या कार्रवाई के दौरान सुरक्षा मानकों का पालन किया गया?
भारी मशीनें चलाते समय क्षेत्र को पूरी तरह खाली क्यों नहीं कराया गया? सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या सड़क चौड़ीकरण के नाम पर लोगों की जान जोखिम में डालना जरूरी था?छावनी क्षेत्र में हुई यह घटना अब केवल अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई नहीं रह गई है, बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता और सुरक्षा व्यवस्थाओं पर गंभीर बहस का विषय बन चुकी है। रहवासियों का कहना है कि विकास जरूरी है, लेकिन अगर विकास लोगों की सुरक्षा और जिंदगी पर भारी पड़ने लगे तो ऐसे विकास के तरीके पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

तीन बाधक मकानों पर हाई कोर्ट का स्टे
छावनी क्षेत्र में मास्टर प्लान की सड़क को लेकर लंबे समय से विरोध चल रहा था। कई बार मामला कोर्ट तक पहुंचा। इसमें सड़क की चौड़ाई को लेकर आपत्तियां थीं। पीड़ितों की ओर से सीनियर एडवोकेट जयेश गुरनानी ने हाई कोर्ट में याचिका लगाई थी।इस सड़क पर तीन बाधक मकानों मथुरावाला मिठाई, बसंत रावत के भवन और एलआईसी की बिल्डिंग पर हाई कोर्ट का स्टे है। उन्होंने कहा कि छावनी के मास्टर प्लान का जोनिंग प्लान ही नहीं है। ऐसे में 80 फीट चौड़ी सड़क को लेकर दोनों ओर से अलाइनमेंट सही नहीं हैं। कहीं ज्यादा तो कहीं कम हिस्से के मकान तोड़े गए हैं।22 मई को निगम ने 124 मकानों के बाधक हिस्सा को हटाया। कार्रवाई के दौरान 7 पोकलेन मशीन और 10 जेसीबी मशीनों का उपयोग किया गया। साथ ही लगभग 150 अधिकारी- कर्मचारी 150 पुलिस और जिला प्रशासन अधिकारी- कर्मचारी मौके पर उपस्थित थे।