
‘पद’ से ‘ममता’… या ‘वनवास’ से डरी ‘दीदी’ का ‘बकवास’…
जब से होश संभाला तब से तेवर भरी राजनीति कर राज्य की सत्ता के शीर्ष मुकाम पर पहुंचकर लगातार 15 वर्ष तक शासन करने वाली ‘दीदी’ को ‘पद’ से इतनी ज्यादा ‘ममता’ हो गई है कि अब वनवास के डरी ‘दीदी’ बकवास पर उतारू हो गई हैं। सात बार की सांसद, एनडीए और यूपीए सरकार में केंद्रीय मंत्री और फिर नई पार्टी तृणमूल कांग्रेस
बनाकर 3 बार लगातार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री रहकर जिन्होंने संविधान को खूब समझा और खूब जाना, अब वही ‘दीदी’ ‘दादा’गिरी करते हुए संविधान के साथ खिलवाड़ करने पर आमादा हैं। संवैधानिक प्रावधान कहते हैं कि पांच साल का कार्यकाल पूरा हो जाने के बाद एक सरकार जारी नहीं रह सकती है। मुख्यमंत्री अपना इस्तीफा राज्यपाल को सौंपता है और कार्यकारी मुख्यमंत्री के रूप में तब तक पद पर बने रहता है जब तक अगला मुख्यमंत्री शपथ नहीं लेता। भले ही उसे खुद ही दोबारा मुख्यमंत्री बनना हो, तब भी इस्तीफे की औपचारिकता से बचा नहीं जा सकता। खुद तीन बार मुख्यमंत्री रहकर ममता को यह कायदे कानून और संवैधानिक प्रावधान भली भांति मालूम हैं। और वह यह भी जानती हैं कि अगर चुनाव दादागिरी के दम पर उन्हें हराया गया है, तब भी उनके पास अब कोई चारा नहीं है। ममता बनर्जी ने कहा है कि उनके इस्तीफा देने का सवाल ही नहीं उठता है। ममता ने कहा कि नैतिक रूप से उनकी विजय हुई है। वह लोकभवन जाकर इस्तीफा नहीं देंगी। पार्टी सदस्यों के साथ आगे की स्ट्रैटेजी पर चर्चा की जाएगी। मैं अब बीजेपी के अत्याचारों को और बर्दाश्त नहीं करूंगी। मैं सड़कों पर लौटूंगी। ममता ने कहा कि हमारा मुकाबला बीजेपी से नहीं था बल्कि चुनाव आयोग से था। चुनाव आयोग ने बीजेपी के लिए काम किया। ममता को यह भली भांति मालूम है कि उनके इस्तीफा नहीं देने से भी पश्चिम बंगाल में संवैधानिक संकट पैदा नहीं हो सकता है। और पश्चिम बंगाल में अब वह सड़क पर आ चुकी हैं। और राजनीति में संघर्षों से उनका गहरा नाता है। पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट सरकार से संघर्ष के बलबूते पर ही उन्होंने इस मुकाम तक की यात्रा पूरी की है। पर तब उम्र का जज्बा था और अब उम्र ही दीदी को जज्बाती बना रही है। और अब दीदी को यह भी मालूम है कि संघर्ष करने की उनकी क्षमता भी सीमित हो गई है। इस्तीफा देने से मना करने पर संविधान के तहत राज्यपाल उनकी सरकार को बर्खास्त कर देंगे। और चुनाव आयोग ने जरूरी अधिसूचना और जनादेश जारी कर दिया है। ऐसे में तय समय के मुताबिक
नया मुख्यमंत्री 9 मई 2026 को शपथ ले ही लेगा। पश्चिम बंगाल की मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल 7 मई 2026 को खत्म हो रहा है। और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के रूप में यह ममता का अंतिम दिन है। और स्ट्रैटजी के बाद भी, अगर वह 7 मई 2026 को इस्तीफा देने लोकभवन पहुंच जाती हैं, तब भी कोई आश्चर्य नहीं होगा। तब कम से कम कार्यवाहक मुख्यमंत्री के रूप में उन्हें एक-दो दिन और भी मिल ही जाएंगे। खैर, एक-दो दिन में वैसे भी सब कुछ सामने आ ही जाएगा।
05 जनवरी 1955 को कोलकाता (पश्चिम बंगाल) में जन्मी ममता एमए, बी.एड., एलएलबी कार्य शिक्षा में प्रशिक्षित, कलकत्ता विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल से शिक्षित होकर पूर्णकालिक राजनीतिक कार्यकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उन्हें राजनीति का भी अच्छा ज्ञान है और समाज में सक्रिय रहने का भी लंबा अनुभव है। छात्र राजनीति से राष्ट्रीय राजनीति तक उनका सफर बेहद चुनौतीपूर्ण रहा है। और अब 71 साल की उम्र में, ममता एक बार फिर संघर्ष करती अपने पुराने दिनों को जरूर याद करेंगी। कलकत्ता दक्षिण से 1984 में आठवीं लोकसभा के लिए पहली बार निर्वाचित दीदी संसदीय जीवन का लम्बा अनुभव समेटे हैं। सात बार सांसद बनने के बाद 20 मई 2011पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। 27 मई 2016 को पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के रूप में दूसरी बार शपथ ली। और 05 मई 2021को पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के रूप में तीसरी बार शपथ लेने वाली ममता अब चौथी बार शपथ लेने से वंचित होकर पद के प्रति ममता से ग्रस्त नजर आ रही हैं।
ममता राजनीति में तब शामिल हो गई थी, जब वह केवल 15 वर्ष की थी। योगमाया देवी कॉलेज में अध्ययन के दौरान, उन्होंने कांग्रेस (आई) पार्टी की छात्र शाखा, छत्र परिषद यूनियंस की स्थापना की, जिसने समाजवादी एकता केन्द्र से संबद्ध अखिल भारतीय लोकतान्त्रिक छात्र संगठन को हराया। वह पश्चिम बंगाल में कांग्रेस (आई) पार्टी में, पार्टी के भीतर और अन्य स्थानीय राजनीतिक संगठनों में विभिन्न पदों पर रही। दिसंबर 1992 में, ममता ने एक शारीरिक रूप से अक्षम लड़की दीपालि बसाक को (जिसका कथित तौर पर सीपीआई(एम) कार्यकर्ता सौभाग्य बसाक द्वारा बलात्कार किया गया था) राइटर्स बिल्डिंग में तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु के पास ले गई, लेकिन पुलिस ने उन्हे उत्पीड़ित करने के बाद गिरफ्तार कर लिया और हिरासत में ले लिया। तब उन्होंने संकल्प लिया कि वह केवल मुख्यमंत्री के रूप में उस बिल्डिंग में फिर से प्रवेश करेंगी। और न केवल ममता ने मुख्यमंत्री के रूप में प्रवेश किया, बल्कि 15 साल मुख्यमंत्री रहने के बाद अब वहां से उनकी विदाई भी हो रही है। पर तब संकल्प था, और अब पद से हटने का उनके पास कोई भी विकल्प नहीं है… पद से ममता भी उनके काम नहीं आएगी और ‘वनवास’ से डरी ‘दीदी’ का ‘बकवास’ उनके आगामी जीवन को निराशा में ही बदलेगा।

कौशल किशोर चतुर्वेदी
कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं