मध्य प्रदेश सरकार का नया बिजनेस जेट बॉम्बार्डियर चैलेंजर-3500 कनाडा से भारत आ रहा है। इसका इस्तेमाल मुख्यमंत्री और दूसरे VIP के लिए होगा। लेकिन जेट के आनेभर से काम खत्म नहीं होता। न यह तुरंत उड़ान भर सकेगा, न प्रदेश के हर एयरपोर्ट पर उतर सकेगा।
आखिर इतना महंगा जेट खरीदने की जरूरत क्यों पड़ी, क्या इस डील से कोई फायदा है समझेंगे मध्य प्रदेश एक्सप्लेनर में…
सवाल 1: सरकार को अपना जेट खरीदने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी?
जवाब- 6 मई 2021 की रात राज्य सरकार का विमान ‘बीचक्राफ्ट किंग एयर बी-200जीटी’ रेमडेसिविर की सप्लाई के दौरान ग्वालियर एयरबेस पर क्रैश लैंड हुआ।
DGCA ने जांच के बाद कैप्टन का लाइसेंस एक साल के लिए निलंबित कर दिया। यह विमान 2020 में करीब ₹65 करोड़ में खरीदा गया था। विमान का बीमा नहीं हो पाया था, इसलिए सरकार को कोई भरपाई नहीं मिली। अब इसे ₹7 करोड़ की रिजर्व कीमत पर बेचने की बोली लगाई गई है, यानी ₹55 करोड़ से ज्यादा का नुकसान।
» तब से राज्य के पास अपना कोई चालू हवाई जहाज नहीं है। सिर्फ एक हेलिकॉप्टर है, जो 2011 में खरीदा गया था, यानी करीब 15 साल पुराना।
» मुख्यमंत्री, राज्यपाल और दूसरे VIP के लिए हर बार विमान किराये पर लेना पड़ता है। विधानसभा में दिए आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी 2021 से नवंबर 2025 के बीच विमान और हेलिकॉप्टर के किराये पर ₹290 करोड़ खर्च हुए।
» 2019 में यह किराया सालाना सिर्फ ₹1.63 करोड़ था। 2025 में नवंबर तक ही यह ₹90 करोड़ से ज्यादा हो गया। जनवरी 2024 से नवंबर 2025 के बीच ₹143 करोड़ खर्च हुए, यानी औसतन करीब ₹21 लाख रोज।
» यह तब हुआ, जब राज्य पर कर्ज ₹5.44 लाख करोड़ है और हर साल सिर्फ ब्याज में ₹27,000 करोड़ जाता है। विमानन विभाग का तर्क है कि इसी बार-बार के किराये को घटाने के लिए जेट खरीदा जा रहा है।
सवाल 2: जेट की कीमत कहीं ₹233 करोड़, कहीं ₹350 करोड़…सही आंकड़ा क्या है?
जवाब- अलग-अलग जगह अलग रकम इसलिए दिख रही है, क्योंकि कहीं सिर्फ जेट की कीमत है और कहीं टैक्स-शुल्क भी जोड़े गए हैं।
2022: सरकार करीब ₹120 करोड़ का जेट चाहती थी। टेक्सट्रोन ने ₹145 करोड़ का प्रस्ताव दिया था, जो बाद में ₹208 करोड़ हो गया। कीमत और डिलीवरी की समय सीमा की वजह से प्रक्रिया रद्द हुई।
मार्च 2024: नया टेंडर निकला। बॉम्बार्डियर और एम्ब्रेयर ने बोली लगाई। रिपोर्ट के मुताबिक, खर्च करीब ₹250 करोड़ और टैक्स उसके ऊपर 30-35% अतिरिक्त आंका गया।
10 जुलाई 2024: कैबिनेट ने बॉम्बार्डियर चैलेंजर-3500 खरीदने को मंजूरी दी। उस समय कीमत ₹233 करोड़ बताई गई।
2026: ताजा जानकारी के मुताबिक, विमान के लिए बजट प्रावधान ₹300 करोड़ और टैक्स, ट्रांसपोर्ट समेत अनुमानित डील ₹350 करोड़।
साथ आ रहे हेलिकॉप्टर (एयरबस ACH160) के साथ भी यही हुआ है। उसकी कीमत ₹150 करोड़ बताई गई थी और टैक्स-शुल्क मिलाकर ₹225 करोड़, यानी करीब 1.5 गुना। विभाग ने अंतिम अनुबंध की राशि और टैक्स का ब्रेकअप सार्वजनिक नहीं किया है।

सवाल 3: क्या अपना जेट आने से सरकार का पैसा सच में बचेगा और कितना?
जवाब- किराया रुकेगा, यह तय है। पर इसे सीधे बचत कहना ठीक नहीं होगा, क्योंकि अपना जेट चलाने की भी लागत है। इसे तीन हिस्सों में समझिए…
1. अभी किराए के विमान पर कितना खर्च हो रहा है?
- ₹290 करोड़ में हेलिकॉप्टर का किराया भी शामिल है, यानी यह जेट से बचने वाले खर्च का आंकड़ा नहीं है।
- 2024 में विमानों का किराया ₹4.75 से ₹5.70 लाख प्रति घंटा था। 2022-23 में यह ₹3.5 से ₹4.45 लाख था।
- विभागीय सूत्रों के मुताबिक, किराये के विमान का उपयोग हो या न हो, स्टेट हैंगर पर खड़े रहने का ₹10 लाख रोज अलग से देना पड़ता है।
2. अपना जेट चलाने में कितना खर्च आएगा?
साल में 450 घंटे उड़ान पर चैलेंजर-3500 का स्थायी खर्च (क्रू, हैंगर, बीमा, मेंटेनेंस) करीब ₹8 करोड़ और कुल सालाना खर्च ₹30-33 करोड़ बैठता है। 200 घंटे पर कुल खर्च करीब ₹18-19 करोड़। यह अमेरिकी बाजार के हिसाब से अनुमान है।
3. गुजरात का अनुभव क्या कहता है?
- गुजरात ने चैलेंजर-650 नवंबर 2019 में ₹197.90 करोड़ में खरीदा।
- विधानसभा में बताया गया कि दो साल (दिसंबर 2022 तक) में ऑपरेशन और मेंटेनेंस के लिए दो निजी एजेंसियों को ₹20.8 करोड़ दिए गए, यानी करीब ₹10 करोड़ सालाना।
- यह दूसरा विमान है और उसके उड़ान घंटे सार्वजनिक नहीं हैं, इसलिए सीधी तुलना नहीं हो सकती। पर यह दिखाता है कि सालाना संचालन खर्च ₹10 करोड़ के आसपास भी रह सकता है।
अब दोनों को साथ रखें। घंटे के हिसाब से अपना जेट किराये से सस्ता नहीं पड़ता। 450 घंटे पर जेट का खर्च करीब ₹7 लाख प्रति घंटा बैठता है, जबकि किराया ₹4.75-5.70 लाख प्रति घंटा है। बचत तब बनती है, जब बिना उड़े दिया जाने वाला स्टैंडिंग चार्ज बंद हो। यही हिसाब ₹350 करोड़ के जेट पर लगाएं तो…

यह तुलना इस मान्यता पर आधारित है कि मौजूदा किराये का ₹10 लाख/दिन वाला स्टैंडिंग चार्ज पूरी तरह खत्म हो जाएगा। वास्तविक बचत उपयोग, ईंधन, मेंटेनेंस, क्रू और दूसरे खर्च के अनुसार बदल सकती है।
सवाल 4: जेट भारत पहुंच भी गया, तो मुख्यमंत्री तुरंत उड़ान क्यों नहीं भर पाएंगे?
जवाब- विमान का आना और उड़ान के लिए तैयार होना एक बात नहीं है। कनाडा से भारत की करीब 11,500-12,000 किलोमीटर की दूरी में जेट को रास्ते में तकनीकी स्टॉप (लंदन या फ्रैंकफर्ट) लेना होगा, क्योंकि उसकी अधिकतम रेंज करीब 6,300 किलोमीटर है। भारत पहुंचने पर राज्य के विमानन विभाग की टीम इसे रिसीव करेगी। इसके बाद अलग प्रक्रिया शुरू होती है…
कस्टम क्लियरेंस: आयात दस्तावेज और बिल ऑफ एंट्री जमा करना।
DGCA रजिस्ट्रेशन: विमान को भारत का अस्थायी VT रजिस्ट्रेशन मिलेगा।
एयरवर्दीनेस निरीक्षण: DGCA के अधिकारी विमान की भौतिक और तकनीकी जांच करेंगे और मेंटेनेंस दस्तावेज देखेंगे।
सर्टिफिकेट ऑफ एयरवर्दीनेस: जांच पूरी होने पर मिलेगा।
उड़ान की अनुमति: विमानन विभाग DGCA से नियमित सरकारी उड़ान की अनुमति लेगा। (नॉन-शेड्यूल्ड फ्लाइट ऑपरेटर सर्टिफिकेट)
जेट उड़ाने के लिए विदेश में प्रशिक्षण पर गए प्रदेश के दो पायलट- विश्वास राय और अरविंद सिंह, पहली कोशिश में टेस्ट पास नहीं कर पाए। ट्रेनिंग 18 दिन में पूरी होनी थी, दोबारा ट्रेनिंग में तय समय से दोगुना वक्त लगा। इसका खर्च राज्य सरकार ने उठाया, पर सटीक आंकड़ा सार्वजनिक नहीं है। अभी उन्हें सिर्फ को-पायलट का सर्टिफिकेट मिला है।
इसलिए बॉम्बार्डियर का एक पायलट FATA (विदेशी चालक दल की अस्थायी मंजूरी) के तहत एक साल तक जेट उड़ाएगा। स्वतंत्र उड़ान से पहले दोनों सरकारी पायलटों को उसके साथ 100 घंटे जेट उड़ाना जरूरी होगा।
सवाल 5: जेट मिल गया, लेकिन क्या मध्य प्रदेश में इसे उड़ाने लायक पूरा सिस्टम तैयार है?
जवाब- इस जेट के लिए विभाग कम से कम 1,800 मीटर और बेहतर संचालन के लिए करीब 2,100 मीटर लंबा रनवे जरूरी मान रहा है।
बॉम्बार्डियर कंपनी के तकनीकी आंकड़ों में सामान्य परिस्थितियों में टेक ऑफ डिस्टेंस 1,474 मीटर दिया गया है। प्रदेश में 8 एयरपोर्ट और करीब 20 हवाई पट्टियां हैं। विभागीय आकलन के मुताबिक, यह जेट करीब 10 जगह उतर सकता है- 7 एयरपोर्ट (भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, खजुराहो, रीवा, दतिया) और 3 हवाई पट्टियां (मंदसौर, सिवनी, मंडला)।
विमानन विभाग ने जिलों के कलेक्टरों को पत्र लिखकर 18-20 पट्टियों के विस्तार के लिए जमीन मांगी है। इनमें आमला, बिरवा (बालाघाट), छिंदवाड़ा, सागर, खंडवा, खरगोन, झाबुआ, गुना, नीमच, पचमढ़ी, रतलाम, नागदा, शहडोल, उमरिया और दमोह शामिल हैं।
विभाग के अनुमान के मुताबिक, सरकारी जमीन हो तो एक पट्टी का विस्तार ₹10-15 करोड़ में हो सकता है, निजी जमीन अधिग्रहण करनी पड़ी तो ₹30-40 करोड़। कुल अनुमान ₹300-400 करोड़ का है। जेट, हेलिकॉप्टर और पट्टियों का अनुमानित खर्च जोड़ें तो यह करीब ₹875-975 करोड़ बैठता है, हेलिपैड के बिना।
हेलिपैड नेटवर्क पर भी काम चल रहा है। अभी प्रदेश में करीब 250 हेलिपैड हैं और अगले दो साल में 63 नए बनाने का लक्ष्य है ताकि हर 50 किलोमीटर के दायरे में एक हेलिपैड रहे।
