मध्य प्रदेश में पटवारी संघ ने एक बार फिर स्वामित्व योजना का काम करने से मना कर दिया है। संघ ने कहा है कि मामले में निलंबित और बर्खास्त किए गए 4 हजार से ज्यादा पटवारियों की बहाली के आदेश कलेक्टरों ने अब तक जारी नहीं किए हैं। इसके बिना वे रजिस्ट्रियां नहीं करेंगे।
पटवारियों की मांग है कि रजिस्ट्रियों में विवाद की स्थिति में उन पर केस न दर्ज हो
मध्य प्रदेश पटवारी संघ के प्रांतीय अध्यक्ष उपेंद्र सिंह और प्रांतीय पटवारी संघ के प्रदेश अध्यक्ष अश्विन सैनी ने रविवार शाम एक वीडियो जारी किया। इसमें कहा- मुख्यमंत्री से मुलाकात के बाद राजस्व विभाग ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 218 के तहत आदेश जारी किया है।
इसके अनुसार, स्वामित्व योजना की रजिस्ट्री में विवाद या न्यायालयीन केस की स्थिति में पटवारियों पर केस नहीं चलाया जाएगा। लेकिन कलेक्टरों ने बहाली के आदेश जारी नहीं किए हैं। इस हालात में प्रदेश के पटवारियों को अभी स्वामित्व योजना के काम से अलग रहना है।
9 अक्टूबर को काम करने की सहमति दी थी

इससे पहले 9 अक्टूबर की शाम सरकार और पटवारी संघ के बीच सहमति बन गई थी। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मुलाकात के बाद संघ ने 12 अक्टूबर से योजना का काम शुरू करने का ऐलान किया था।
संघ के प्रांतीय अध्यक्ष बघेल ने कहा था- योजना में न्यायिक संरक्षण के आदेश जारी किए जाएंगे। 17 सितंबर के बाद पटवारियों के खिलाफ की गई कार्रवाइयों को शून्य करने पर भी सहमति बनी है। वेतन विसंगति के मामले में आयोग के गठन के बाद विचार किया जाएगा। मुख्यमंत्री ने 27 अक्टूबर को होने वाले महासम्मेलन में आर्थिक मांगों पर घोषणा करने का आश्वासन दिया है।

क्या है स्वामित्व योजना
स्वामित्व योजना के तहत गांवों की आबादी भूमि का ड्रोन सर्वे कर वहां रहने वाले लोगों के संपत्ति संबंधी अधिकारों का रिकॉर्ड तैयार किया गया है। सरकार अब ऐसे लोगों को घर-जमीनों की मुफ्त रजिस्ट्री दे रही है। 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक ‘स्वामित्व योजना’ के तहत मध्य प्रदेश में करीब 50 लाख संपत्तियों की रजिस्ट्री की जानी है।
खास बात यह है कि हितग्राहियों से स्टाम्प ड्यूटी और पंजीयन शुल्क नहीं लिया जा रहा है। सरकार ने इसका खर्च खुद उठाने का फैसला किया है। प्रदेश में अब तक 68.11 लाख अधिकार अभिलेख तैयार किए जा चुके हैं, जिनमें 48.32 लाख निजी संपत्तियां शामिल हैं।
पटवारियों को क्या आपत्ति
स्वामित्व योजना में ग्रामीण को ‘क्रेता’ और पटवारी को ‘विक्रेता/निष्पादक’ की भूमिका दी गई है, यानी दस्तावेज पर पटवारी के हस्ताक्षर से यह दर्ज होता है कि वह सरकारी जमीन का हस्तांतरण कर रहा है, जबकि पटवारी खुद उस जमीन का मालिक नहीं है।
पटवारियों की आपत्ति यही है कि भविष्य में जमीन की सीमा, हिस्सेदारी या कब्जे को लेकर कोई विवाद हुआ तो निष्पादक के तौर पर उनकी कानूनी जिम्मेदारी तय हो सकती है, जबकि जमीन के मालिकाना हक का फैसला करने या रिकॉर्ड में बदलाव करने का अधिकार उनके पास नहीं है।
पटवारियों को रिकॉर्ड की गड़बड़ियां मिली हैं। गुना में पटवारी संघ का आरोप है कि कई मामलों में मौके पर कब्जा सिर्फ एक भाई का है, जबकि पट्टे में तीन भाइयों के नाम दर्ज हैं- यानी भविष्य में विवाद की आशंका सिर्फ अंदेशा नहीं, रिकॉर्ड में पहले से दिख रही है।
इसी वजह से पटवारी संघ का कहना है कि उन्हें योजना से आपत्ति नहीं है, लेकिन ‘निष्पादक’ की भूमिका और उससे जुड़ी जिम्मेदारी साफ होनी चाहिए। पटवारियों की मांग है कि कार्रवाई वापस हो, कानूनी जिम्मेदारी स्पष्ट की जाए और निजी पहचान संबंधी डेटा सुरक्षित रखे जाएं।
