इंदौर के शिशुकुंज स्कूल में भोजन करने के बाद करीब 150 बच्चों के बीमार पड़ने की घटना ने खाद्य सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि घटना के करीब तीन सप्ताह बाद भी यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि बच्चों के बीमार होने की वजह भोजन में मिलावट, खराब डेयरी उत्पाद या कोई अन्य कारण था। इसकी वजह यह है कि जांच के लिए भेजे गए खाद्य नमूनों की रिपोर्ट अब तक नहीं आई है।

20 जून को हुई थी घटना
20 जून को शिशुकुंज स्कूल में भोजन करने के बाद बच्चों की तबीयत बिगड़ने लगी थी। 22 जून को मामला सामने आने के बाद प्रशासन और खाद्य सुरक्षा विभाग की टीम ने स्कूल के किचन और मेस का निरीक्षण किया। जांच के दौरान 10 पैकेट एक्सपायरी डेट के मसाले और दो एक्सपायर्ड नमकीन के पैकेट मिले। अधिकारियों ने मौके पर ही किचन को सील कर दिया और पनीर, आइसक्रीम, दूध, दाल, कोफ्ते, चावल, रोटी, मसाले तथा पेयजल सहित कुल 23 खाद्य नमूने जांच के लिए भोपाल स्थित राज्य खाद्य प्रयोगशाला भेजे। मामले में प्रकरण भी दर्ज किया गया।

टीम ने स्कूल के किचन में खाद्य सामग्री की जांच की।
डेयरी उत्पादों पर टिकी जांच
जांच अधिकारियों का शुरू से मानना रहा है कि केवल एक्सपायर्ड मसाले या नमकीन इतनी बड़ी संख्या में बच्चों के बीमार पड़ने का मुख्य कारण नहीं हो सकते। इसी कारण जांच का फोकस डेयरी उत्पादों पर रखा गया। विशेषज्ञों के अनुसार गर्मी के मौसम में यदि कोल्ड स्टोरेज या फ्रीजर का तापमान निर्धारित स्तर पर नहीं रखा जाए तो दूध, पनीर और आइसक्रीम जैसे उत्पाद तेजी से खराब हो जाते हैं। ऐसे खाद्य पदार्थों के सेवन से उल्टी-दस्त और पेट संबंधी संक्रमण बड़ी संख्या में फैल सकते हैं।

आइसक्रीम के सैंपल पर भी उठे सवाल
जांच के दौरान एक बड़ी खामी भी सामने आई। जानकारी के अनुसार घटना वाले दिन बच्चों ने जिस बैच की आइसक्रीम खाई थी, उसका सैंपल नहीं लिया जा सका क्योंकि वह पूरी तरह खत्म हो चुकी थी और उसकी जगह दूसरा बैच आ चुका था। ऐसे में यह पता लगाना लगभग असंभव हो गया है कि बच्चों के बीमार होने की वजह वही आइसक्रीम थी या नहीं।

सैकड़ों सैंपलों की रिपोर्ट लंबित
सूत्रों के मुताबिक जनवरी से अब तक इंदौर से विभिन्न स्कूलों, होटलों और प्रतिष्ठानों से लिए गए सैकड़ों खाद्य नमूनों की जांच रिपोर्ट भोपाल स्थित राज्य खाद्य प्रयोगशाला में लंबित है। इनमें शिशुकुंज स्कूल के सैंपल भी शामिल हैं। रिपोर्ट में हो रही देरी के कारण कई मामलों में कार्रवाई आगे नहीं बढ़ पा रही है।
रिपोर्ट नहीं तो कार्रवाई कैसे?
खाद्य सुरक्षा विभाग लगातार सैंपलिंग और जांच अभियान चलाने का दावा करता है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि लैब रिपोर्ट के बिना मिलावट या खाद्य सुरक्षा नियमों के उल्लंघन को कानूनी रूप से साबित करना संभव नहीं होता। ऐसे में दोषियों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई अधूरी रह जाती है और जांच लंबी खिंचती रहती है।

9 करोड़ की नई लैब भी नहीं आई काम
पिछले वर्ष मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इंदौर के तलावली चांदा में करीब 9 करोड़ रुपए की लागत से अत्याधुनिक फूड टेस्टिंग लैब का लोकार्पण किया था। इसका उद्देश्य इंदौर और आसपास के जिलों के खाद्य नमूनों की जांच स्थानीय स्तर पर कर जल्द रिपोर्ट उपलब्ध कराना था। हालांकि, लैब को अब तक एनएबीएल (NABL) प्रमाणन नहीं मिल सका है, जिसके कारण वहां नियमित जांच शुरू नहीं हो पाई। परिणामस्वरूप आज भी इंदौर के खाद्य नमूने जांच के लिए भोपाल भेजे जा रहे हैं, जिससे रिपोर्ट आने में लंबा समय लग रहा है।