सख्त “कॉस्ट कटिंग” जरूरी है… कौशल किशोर चतुर्वेदी

सख्त “कॉस्ट कटिंग” जरूरी है…
मध्य प्रदेश सरकार पर लगातार बढ़ते कर्ज के चलते “कॉस्ट कटिंग” जैसा शब्द
प्रासंगिक हो गया है। भले ही राज्य की परिसंपत्तियों का मूल्य उसकी कुल देनदारियों से अधिक है, जिससे वित्तीय स्थिति संतुलित बनी हुई है। लेकिन कर्ज का बढ़ता बोझ कहीं न कहीं सरकारों को बैकफुट पर लाने का काम तो करता ही है। और लगभग हर विधानसभा सत्र में विपक्ष कर्ज के बढ़ते बोझ को लेकर सरकार पर तीखा प्रहार करने से नहीं चूकता है। ऐसे में मानसून सत्र के पहले सरकार ने “कॉस्ट कटिंग” की नीति लाकर, यह संदेश देने की कोशिश की है कि सरकार मितव्ययता को लेकर गंभीर है। और नीति लाकर सरकार ने इस दिशा में पहला कदम बढ़ा दिया है। विदेश यात्राओं, नए कॉन्ट्रैक्ट्स और वीआईपी कल्चर पर रोक लगाकर सरकार ने यह

संदेश देने की कोशिश की है कि
धन का अपव्यय बिल्कुल भी नहीं होने दिया जाएगा। पर नीति का क्रियान्वयन कैसे होता है इसके आधार पर ही भविष्य में सरकार की मंशा के व्यावहारिक परिणामों पर चर्चा ज़रूर हो सकेगी।
मध्यप्रदेश की डॉ. मोहन यादव सरकार ने 7 जुलाई 2026 को बाजार से 3,600 करोड़ रुपए का नया कर्ज उठाया है। यह राशि दो अलग-अलग किश्तों में 18 वर्ष और 30 वर्ष की अवधि के लिए जुटाई गई है। इस नई उधारी के बाद चालू वित्त वर्ष में राज्य सरकार द्वारा लिया गया कुल कर्ज 17,400 करोड़ रुपए हो गया है, जबकि प्रदेश पर कुल देनदारी बढ़कर करीब 5.6114 लाख करोड़ रुपए पहुंच गई है। सरकार के अनुसार, 31 मार्च 2026 की स्थिति में मध्यप्रदेश पर कुल 4,88,714.17 करोड़ रुपए का ऋण था। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा 3,33,278.21 करोड़ रुपए के मार्केट लोन का है। इसके अलावा वित्तीय संस्थानों, केंद्र सरकार, राष्ट्रीय लघु बचत निधि और अन्य स्रोतों से लिए गए ऋण भी कुल देनदारियों में शामिल हैं। सबसे बड़ी बात है कि कर्ज का यह सिलसिला थमने वाला नहीं है, क्योंकि सरकार को विकास कार्यों और सामाजिक दायित्वों के निर्वहन में लगातार बजट की एक बड़ी राशि खर्च करना ही पड़ेगा। ऐसे में “कॉस्ट कटिंग” से नहीं बल्कि सख्त “कॉस्ट कटिंग” से ही धन की बचत की थोड़ी बहुत गुंजाइश निकाली जा सकती है।

वैसे कॉस्ट कटिंग नीति पर महत्वपूर्ण चर्चा मानसून सत्र में ही सामने आने वाली है। जब नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार और सम्पूर्ण विपक्ष यह उम्मीद करेगा कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव खुद भी सरकारी हवाई खर्चों में कमी लाकर कॉस्ट कटिंग जैसे शब्द को चरितार्थ करें। तो खुद भी अपनी बहुत सारी औपचारिकताएं वर्चुअल माध्यम से पूरी कर वास्तव में, कॉस्ट कटिंग शब्द को अर्थपूर्ण बना सकते हैं। वित्त विभाग द्वारा जारी दिशा-निर्देश अनुसार वित्तीय वर्ष 2026-27 और आगामी वर्ष 2027-28 के बजट आवंटन को व्यवस्थित करने के उद्देश्य से राज्य शासन ने बड़ा प्रशासनिक फैसला लिया है। फिजूलखर्ची पर पूरी तरह लगाम लगाते हुए कई तरह की गतिविधियों और खर्चों पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगा दिया है। प्रशासनिक स्तर पर इस कदम को कड़े वित्तीय अनुशासन और मितव्ययिता के रूप में देखा जा रहा है। यह नियम सभी सरकारी विभागों, निगमों, मंडलों, सार्वजनिक उपक्रमों और विश्वविद्यालयों पर अनिवार्य रूप से लागू होगा। आदेश के अनुसार वीआईपी संस्कृति और फिजूलखर्ची से जुड़े कई बड़े खर्चों पर रोक लगा दी गई है। अब बेहद अनिवार्य मामलों को छोड़कर राज्य सरकार या उसके उपक्रमों के खर्च पर होने वाली सभी विदेश यात्राओं पर आगामी आदेश तक रोक रहेगी। साथ ही नए साल या अन्य उत्सवों पर छपने वाले महंगे सरकारी कैलेंडर, डायरी के मुद्रण और वीआईपी उपहारों व स्वागत समारोहों के खर्च को भी पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है। अधिकारियों के हवाई सफर को लेकर भी कड़ा रुख अपनाया गया है। इसके तहत सरकारी कार्यों के लिए इकोनॉमी क्लास के अलावा किसी भी अन्य श्रेणी में यात्रा करने पर पाबंदी लगा दी गई है। शासकीय बैठकों और कार्यालयों के रखरखाव में भी बड़े बदलाव किये गये हैं। अब होटलों या व्यावसायिक केंद्रों में होने वाली महंगी कार्यशालाओं, बैठकों और ट्रेनिंग प्रोग्राम्स पर रोक लगा दी गई है और इनके स्थान पर शासकीय भवनों के उपयोग या वर्चुअल माध्यम व वेबिनार को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए गए हैं। इसके अलावा कार्यालयों में होने वाले आंतरिक साज-सज्जा के गैर-जरूरी खर्चों को भी रोक दिया गया है।
परिवहन व्यवस्था को लेकर सरकार ने ‘व्हीकल पूलिंग’ नीति को अनिवार्य किया है। इसके तहत यदि किसी अधिकारी को अतिरिक्त प्रभार सौंपा जाता है, तो उस पद के वाहन को किसी अन्य पात्र अधिकारी को स्थानांतरित किया जाएगा ताकि किराए के वाहनों का खर्च कम हो सके। विभागाध्यक्षों को निर्देश दिए गए हैं कि वे अनुबंधित गाड़ियों की संख्या सीमित करें और दो या दो से अधिक अधिकारियों के बीच एक ही वाहन आवंटित करने की व्यवस्था सुनिश्चित करें। इसके साथ ही किसी भी प्रकार की नई परामर्श सेवाओं के अनुबंध पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है।
राज्य के खजाने को मजबूत करने के लिए राज्य शासन ने एक और महत्वपूर्ण वित्तीय कदम उठाया है। इसके अंतर्गत सभी निगमों, मंडलों और सरकारी उपक्रमों को निर्देशित किया गया है कि वे अपने लाभांश की अधिकतम संभव राशि सीधे राज्य शासन के खाते में जमा कराएं। आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि बजट 2027-28 की तैयारियों को देखते हुए सरकार का यह कदम जनता के टैक्स के पैसे को बुनियादी ढांचे व जन-कल्याणकारी योजनाओं में डाइवर्ट करने की दिशा में एक बड़ा और साहसिक प्रयास है।
वैसे कॉस्ट कटिंग नीति लागू करने के बाद यह भावनाएं सरकारी तौर पर व्यक्त की जा रही हैं। लेकिन एक सामान्य व्यक्ति और विपक्ष के नजरिये से देखा जाए तो सरकार को इस नीति के क्रियान्वयन के लिए अच्छी नीयत से काम करना पड़ेगा। नेताओं और मंत्रियों के काफिलों पर पूरी तरह से अंकुश लगाना पड़ेगा तो खुद मुख्यमंत्री को भी मितव्ययिता का उदाहरण
प्रदेश की 9 करोड़ आबादी
के सामने पेश करना पड़ेगा। सरकारी नौकरशाहों पर अंकुश लगाना भी इतना आसान नहीं है जितना कॉस्ट कटिंग नीति के तहत अपेक्षा की जा रही है। और अगर केवल छोटे अधिकारियों पर यह नीति लागू कर सरकार ने नीति की सफलता को स्थापित करने की कोशिश की तो शायद यह दिखावा बनकर रह जायेगी…।

कौशल किशोर चतुर्वेदी

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं