बच्ची के शोर नहीं मचाने पर हाईकोर्ट ने उठाए सवाल: 12 साल की बच्ची से गलत हरकत के प्रयास मामले में आरोपी की बरी बरकरार; चोट के निशान व स्वतंत्र गवाह नहीं मिले, पारिवारिक विवाद पर भी संदेह, अभियोजन आरोप संदेह से परे साबित नहीं कर सका

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने 12 साल की बच्ची से गलत हरकत करने के प्रयास के मामले में आरोपी को बरी करने के निचली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। जस्टिस जय कुमार पिल्लई की बेंच ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं रहा।

कोर्ट ने मामले में कई परिस्थितियों को महत्वपूर्ण माना। इनमें घटना के दौरान बच्ची का शोर या चीख-पुकार नहीं करना, शरीर पर चोट के निशान नहीं मिलना, घटनास्थल की परिस्थितियां और किसी स्वतंत्र स्थानीय गवाह की जांच नहीं होना शामिल हैं। कोर्ट ने इन कमियों के आधार पर अभियोजन की कहानी को संदिग्ध माना।

कोर्ट ने कहा- बच्ची का शोर नहीं मचाना स्वाभाविक नहीं

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी बच्ची को जबरन गलत हरकत के लिए खींचकर ले जाया जा रहा था तो ऐसी स्थिति में उसके मदद के लिए चिल्लाने या शोर मचाने की स्वाभाविक संभावना थी। लेकिन मामले में घटना के दौरान किसी तरह की चीख-पुकार या शोर होने की बात सामने नहीं आई

बेंच के अनुसार, यह परिस्थिति अभियोजन की कहानी को लेकर गंभीर संदेह पैदा करती है।

घर के बजाय सार्वजनिक जगह ले जाने की कहानी पर भी सवाल

अभियोजन के मुताबिक आरोपी बच्ची को उसके घर के पास से खींचकर नाली की ओर ले गया था। हाई कोर्ट ने इस तथ्य को भी महत्वपूर्ण माना। कोर्ट ने कहा कि यदि आरोपी का वास्तव में गलत हरकत करने का इरादा था तो बच्ची का घर ही अपेक्षाकृत एकांत स्थान था। इसके बजाय उसे ऐसे स्थान की ओर ले जाने की बात कही गई, जहां लोगों की आवाजाही थी। यह परिस्थिति अभियोजन की कहानी के अनुरूप नहीं लगती।

इसके अलावा कोर्ट ने पाया कि आधिकारिक मौका नक्शे में उस नाली का स्थान भी स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं किया गया था।

हाथ छुड़ाने के लिए संघर्ष किया तो चोट क्यों नहीं?

अभियोजन की कहानी के अनुसार बच्ची ने आरोपी से अपना हाथ छुड़ाया और वहां से भाग गई थी। हाई कोर्ट ने कहा कि यदि बच्ची ने वास्तव में आरोपी से बचने के लिए संघर्ष किया था तो उसके हाथ या शरीर पर घर्षण अथवा चोट के निशान मिलने की संभावना थी।

हालांकि, मेडिकल रिपोर्ट में बच्ची के शरीर पर किसी तरह की चोट नहीं मिली। कोर्ट ने इस तथ्य को भी अभियोजन के खिलाफ महत्वपूर्ण परिस्थिति माना।

घनी आबादी वाले इलाके में भी स्वतंत्र गवाह नहीं

हाईकोर्ट ने यह भी गौर किया कि घटना का स्थान घनी आबादी वाला और लोगों की आवाजाही वाला क्षेत्र था। इसके बावजूद जांच अधिकारी ने किसी स्वतंत्र स्थानीय व्यक्ति को गवाह नहीं बनाया। ऐसे मामले में घटनास्थल के आसपास मौजूद लोगों की गवाही महत्वपूर्ण हो सकती थी। स्वतंत्र गवाहों की जांच नहीं किया जाना भी अभियोजन के मामले की एक महत्वपूर्ण कमी है।

घटना से एक दिन पहले हुआ था दोनों परिवारों में विवाद

मामले में एक और अहम तथ्य सामने आया। घटना से एक दिन पहले बच्ची के पिता और आरोपी के पिता के बीच विवाद हुआ था। बच्ची ने अपने बयान में भी इस विवाद का जिक्र किया था। इसके बाद उसके पिता ने आरोपी के खिलाफ पुलिस में शिकायत की थी।

हाई कोर्ट ने माना कि निचली कोर्ट का यह देखना उचित था कि कहीं मौजूदा प्राथमिकी पहले से चले आ रहे पारिवारिक विवाद का परिणाम तो नहीं थी।

बच्ची की गवाही पर कोर्ट ने कही अहम बात

राज्य की ओर से दलील दी गई थी कि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय हो तो केवल उसके बयान के आधार पर भी आरोपी को दोषी ठहराया जा सकता है। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का भी हवाला दिया गया।

हाई कोर्ट ने इस कानूनी सिद्धांत को स्वीकार करते हुए कहा कि पीड़िता की अकेली गवाही के आधार पर दोषसिद्धि संभव है, लेकिन इसके लिए उसकी गवाही ऐसी होनी चाहिए जिस पर अदालत को पूरा और अडिग विश्वास हो। मौजूदा मामले में कोर्ट को अभियोजन की कहानी में कई महत्वपूर्ण कमियां मिलीं।

अभियोजन के अनुसार 5 मार्च 2021 की शाम करीब 5 बजे 12 वर्षीय बच्ची अपने घर के बाहर खुले आंगन में झाड़ू लगा रही थी। इसी दौरान उसका पड़ोसी आरोपी वहां आया और उसका हाथ पकड़कर गलत हरकत करने की बात कही।

आरोप था कि आरोपी बच्ची को पास की नाली की ओर खींचकर ले गया और गलत हरकत करने का प्रयास किया। बच्ची ने विरोध करते हुए अपना हाथ छुड़ाया और हैंडपंप की ओर भाग गई। वहां उसने अपने भाई को घटना की जानकारी दी। भाई ने माता-पिता को फोन किया, जिसके बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई।

उसी दिन बच्ची की मेडिकल जांच कराई गई थी और 25 मार्च 2021 को आरोपी के खिलाफ आरोपपत्र पेश किया गया था।

हाईकोर्ट ने आरोपी की बरी बरकरार रखी

मामले में राज्य और पीड़िता की ओर से निचली कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील दायर की गई थी। निचली कोर्ट ने आरोपी को POCSO एक्ट के आरोपों से बरी कर दिया था।

हाईकोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों, मेडिकल रिपोर्ट, घटनास्थल की परिस्थितियों, गवाहों के बयानों और दोनों परिवारों के बीच पूर्व विवाद को देखते हुए निचली कोर्केट फैसले में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया। इस तरह हाईकोर्ट ने आरोपी को बरी किए जाने का फैसला बरकरार रखा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *