बालाघाट के समता चौक पर 10 फरवरी को स्कूटी स्लिप हुई तो विवेक तिरपुड़े खुद घर लौट आए। कपड़े बदले, दोस्तों से बात की और फिर सरदार पटेल अस्पताल चले गए। एक्सरे में हाथ की उंगली में फ्रैक्चर निकला। डॉक्टरों ने प्लास्टर कर दिया। परिवार को लगा कि मामूली चोट है, कुछ दिन में सब सामान्य हो जाएगा।
लेकिन उसी शाम डॉक्टरों ने कहा कि जल्दी रिकवरी के लिए 20 मिनट की एक छोटी सर्जरी करनी होगी। डॉक्टरों ने भरोसा दिलाया- कोई रिस्क नहीं है। 36 साल के विवेक हंसते हुए ऑपरेशन थिएटर में गए, लेकिन फिर कभी होश में नहीं लौटे।परिजन का आरोप है कि ऑपरेशन के दौरान एनस्थीसिया देने में गंभीर लापरवाही की गई। सांस की नली में डाली जाने वाली ट्यूब आहार नली में चली गई, जिससे ब्रेन तक ऑक्सीजन नहीं पहुंची। अब विवेक पिछले 100 दिन से कोमा में हैं।
इलाज में अब तक 50 लाख खर्च कर चुका परिवार
परिजन का आरोप है कि ऑपरेशन के दौरान एनस्थीसिया देने में गंभीर लापरवाही की गई। सांस की नली में डाली जाने वाली ट्यूब आहार नली में चली गई, जिससे ब्रेन तक ऑक्सीजन नहीं पहुंची। अब विवेक पिछले 100 दिन से कोमा में हैं।
इलाज में अब तक 50 लाख खर्च कर चुका परिवार
परिवार उन्हें लेकर बालाघाट से नागपुर और फिर भोपाल के निजी अस्पतालों तक भटक रहा है। इलाज में अब तक करीब 50 लाख रुपए खर्च हो चुके हैं। पुलिस ने डॉक्टरों पर केस दर्ज कर लिया है। वहीं, मध्य प्रदेश मेडिकल काउंसिल ने भी तीन डॉक्टरों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

मां बोलीं- अब दिन और तारीख याद नहीं रहते
विवेक तिरपुड़े सिविल इंजीनियर हैं। उन्होंने एनवायरमेंट साइंस में पोस्ट ग्रेजुएशन किया और हाल ही में केमिकल मटेरियल प्रोसेसिंग की कंपनी शुरू की थी। पिता रिटायर्ड इंजीनियर हैं। बड़े भाई अमित आईआईटी मुंबई से मेटेरोलॉजी में एमटेक हैं जबकि भाभी दीक्षा डॉक्टर हैं।
पिता आरसी तिरपुड़े कहते हैं, ‘अगर अस्पताल में इमरजेंसी संभालने की सुविधा नहीं थी तो ऑपरेशन नहीं करना चाहिए था। डॉक्टरों ने अब तक यह जानने की कोशिश भी नहीं की कि हमारा बेटा किस हालत में है।’ मां विद्या कहती हैं- अब दिन और तारीख याद नहीं रहती। रोज लगता है कि आज बेटा आंख खोलेगा, लेकिन वो दिन नहीं आता।

मां हर दिन बेटे के सिर पर इस उम्मीद से हाथ फेरती हैं कि आज इसे होश आ जाएगा।
भाई की शादी को 6 महीने हुए, अब अस्पताल ही दूसरा घर
विवेक के बड़े भाई अमित की शादी को अभी छह महीने ही हुए हैं। वे और उनकी पत्नी दीक्षा पिछले तीन महीने से अस्पतालों के चक्कर काट रहे हैं। अब अस्पताल ही उनका दूसरा घर बन गया है। अमित कहते हैं, “मैं चाहता हूं कि किसी और परिवार के साथ ऐसा न हो। जब तक कार्रवाई नहीं होगी, हम लड़ाई लड़ेंगे।”

जीरो रिस्क कहा था, अब तक कोमा में है
अमित बताते हैं कि 10 फरवरी को एक्सीडेंट के बाद विवेक ने एक्सरे कराया तो हाथ की थर्ड मेटाकार्पल बोन टूटने की बात सामने आई। प्लास्टर लगाने के बाद डॉक्टरों ने कहा कि जल्दी रिकवरी के लिए छोटा ऑपरेशन कराना बेहतर रहेगा। परिवार को भरोसा दिलाया गया कि यह सिर्फ 20 मिनट की प्रक्रिया है और रिस्क जीरो है।शाम 5 बजे ऑपरेशन तय हुआ। विवेक हंसते हुए ऑपरेशन थिएटर में गया। परिवार को लगा कि कुछ देर में वह बाहर आ जाएगा। लेकिन शाम 6 बजे तक जब कोई जानकारी नहीं मिली तो परिवार को शक हुआ।

सरकारी जांच में अस्पताल की बड़ी कमी उजागर
जांच रिपोर्ट में सामने आया कि एनस्थीसिया टॉक्सिसिटी का जरूरी एंटीडोट अस्पताल में उपलब्ध ही नहीं था, जबकि ऐसी सर्जरी करने वाले अस्पताल में इसका होना अनिवार्य है।21 अप्रैल को बालाघाट सीएमएचओ की रिपोर्ट में यह भी जिक्र किया गया है कि अस्पताल में आपात स्थिति संभालने के लिए क्वालिफाइड इंटेंसिविस्ट और कोड ब्लू प्लान मौजूद नहीं था। रिपोर्ट में इसे अस्पताल प्रबंधन की गंभीर लापरवाही माना गया।

सीएमएचओ की टीम ने ये जांच रिपोर्ट तैयार की।
अस्पताल के डायरेक्टर बोले- पेशेंट ड्रग एडिक्ट था
सीएमएचओ रिपोर्ट और परिजन के आरोपों पर सरदार पटेल अस्पताल के डायरेक्टर वीरेश्वर सिंह ने लापरवाही से इनकार किया है। उनका कहना है कि विवेक ड्रग एडिक्ट था। शराब भी लेता था। इसी वजह से पहले एनस्थीसिया का असर नहीं हुआ और दोबारा डोज देना पड़ा।
डॉक्टर्स की सफाई- इलाज में कोई लापरवाही नहीं की
ऑर्थो सर्जन डॉ. शुभम वैद्य ने कहा- विवेक ब्रेन ट्रॉमा के लिए एडमिट हुआ था। अगले दिन मुझे न्यूरो सर्जन डॉ. प्रिंस वर्मा ने फोन किया कि उसके हाथ में चोट हैं। मैंने कंजरवेटिव प्लास्टर कर दिया।इसके बाद मुझे फिर न्यूरो सर्जन ने फोन किया कि फैमिली सर्जरी के लिए तैयार है। 5 बजे ऑपरेशन तय हुआ। एनस्थीसिया के डोज में प्रॉब्लम था या उसका इफेक्ट नहीं था, जिसके चलते मरीज को दर्द हो रहा था।
मैं तो सर्जरी शुरू ही नहीं कर पाया। उसकी पल्स नहीं मिल रही थी। मैंने तो उसे रिवाइव किया।वहीं, डॉ. प्रिंस वर्मा ने कहा कि कोर्ट में केस चल रहा है। सीएमएचओ की रिपोर्ट में अस्पताल की कोई लापरवाही नहीं मिली है। वैसे भी उस केस में मेरा कोई लेना-देना नहीं है। मैं ट्रीटिंग डॉक्टर नहीं था। एनस्थेटिस्ट डॉ. सृष्टि जैन से भी भास्कर ने संपर्क किया। उन्होंने कहा कि फिलहाल स्वास्थ्य ठीक नहीं है इसलिए इस बारे में अभी कुछ नहीं कह सकती।