‘अंधेरे में’…कहाँ जाऊँ, दिल्ली या उज्जैन… कौशल किशोर चतुर्वेदी

‘अंधेरे में’…कहाँ जाऊँ, दिल्ली या उज्जैन…
मध्य प्रदेश के वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य में यह शीर्षक, ‘अंधेरे में’…कहाँ जाऊँ, दिल्ली या उज्जैन… सौ फीसदी सच नजर आता है। यह संयोग ही है कि इस समय मध्यप्रदेश सरकार के मुखिया डॉ. मोहन यादव महाकाल की नगरी उज्जैन से हैं। और इस समय केंद्र में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार है। और यह बात भी कि यदि देखा जाए तो इस समय मध्य प्रदेश के लिए सत्ता के दो सर्वशक्तिशाली केन्द्र उज्जैन और दिल्ली ही हैं। तो अगर शीर्षक की दृष्टि से निहितार्थ निकाले जाएं तो अंधेरे में रोशनी के दो प्रमुख केन्द्र उज्जैन और दिल्ली ही नजर आते हैं। दिल्ली सभी भाजपा शासित राज्यों की सरकारों के लिए शक्ति का प्रमुख केंद्र है तो मध्य प्रदेश के संदर्भ में उज्जैन मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव कि गृह नगरी होने के साथ-साथ सत्ता का प्रमुख केंद्र भी बन गया है। ऐसे में अंधेरे में उजियारे का भरोसा सत्ता के इन दो केंद्रों से किया ही जा सकता है।
लेकिन यहाँ हम ‘अंधेरे में’ कविता की बात कर रहे हैं। यह उज्जैन से संबंधित रहे गजानन माधव मुक्तिबोध की एक प्रसिद्ध कविता है। 8 भागों में विभक्त इस कविता ‘अँधेरे में’ में एक पंक्ति यह है कि कहाँ जाऊँ, दिल्ली या उज्जैन…।
हम आपको बता दें कि गजानन माधव मुक्तिबोध की प्रसिद्ध लंबी कविता ‘अँधेरे में’ हिंदी कविता के इतिहास में एक मील का पत्थर है। यह कविता उनके प्रसिद्ध कविता-संग्रह ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ में संकलित है। आठ खंडों में बंटी यह रचना आधुनिक भारतीय समाज, मध्यवर्गीय विडंबनाओं, राजनीतिक भ्रष्टाचार और व्यक्ति के अंतर्मन के गहरे द्वंद्व का एक ज्वलंत दस्तावेज़ है। इस कविता की रचना 1957 से 1962 के बीच हुई थी। यह प्रारंभिक रूप में 1964 में ‘कल्पना’ पत्रिका में ‘आशंका के दीप अंधेरे में’ शीर्षक से प्रकाशित हुई थी। शमशेर बहादुर सिंह ने इसे आधुनिक जन-इतिहास का ‘दहकता इस्पाती दस्तावेज़’ कहा है। मुक्तिबोध ने अपनी बात कहने के लिए फैंटेसी का बेहतरीन इस्तेमाल किया है, जो उनके अचेतन मन और सपनों की दुनिया का परिचायक है।कविता में संवाद और भावों का उतार-चढ़ाव किसी नाटक की तरह चलता है। इसमें कवि का ‘मैं’ (चेतन मन/सुविधाभोगी) और ‘वह’ (अवचेतन मन/क्रांतिकारी प्रेरणा) के बीच लगातार संघर्ष चलता रहता है। दरअसल, उस समय देश आज़ाद तो हो गया था, लेकिन आम जनता के जीवन में कोई सुधार नहीं आया था। स्वतंत्रता सेनानी गुमनामी में खो गए थे और अवसरवादी लोग सत्ता पर हावी हो गए थे। इस कविता में साहित्यकार, शिक्षक और पत्रकार जैसे बुद्धिजीवी वर्ग की चुप्पी और पूंजीवादी व्यवस्था के आगे घुटने टेक देने पर कवि ने करारा व्यंग्य किया है। कविता का नायक आत्ममंथन करता है और समाज की विकृतियों के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा देता है।
तो हम कविता ‘अँधेरे में’ के उस अंतरा की तरफ खुद को मोड़ते हैं जिसमें मध्य प्रदेश में वर्तमान संदर्भ में प्रासंगिक एक पंक्ति ‘कहाँ जाऊँ, दिल्ली या उज्जैन’… आई है। कविता के चौथे खंड का यह अंश है-
अब तक क्या किया,
जीवन क्या जिया,
ज़्यादा लिया और दिया बहुत-बहुत कम
मर गया देश, अरे, जीवित रहे गए तुम…
मेरा सिर गरम है,
इसीलिए भरम है।
सपनों में चलता है आलोचन,
विचारों के चित्रों की अवलि में चिंतन।
निजत्व-माफ़ है बेचैन,
क्या करूँ, किससे कहूँ,
कहाँ जाऊँ, दिल्ली या उज्जैन?
वैदिक ऋषि शुनःशेप के
शापभ्रष्ट पिता अजीगर्त के समान ही
व्यक्तित्व अपना ही, अपने से खोया हुआ
वही उसे अकस्मात् मिलता था रात में
पागल था दिन में
सिर-फिरा विक्षिप्त मस्तिष्क।
और मुक्तिबोध के इस कविता के तीसरे खंड के एक अंश को देखें तो…
जागते में फिर से याद आने लगा वह स्वप्न,
फिर से याद आने लगे अँधेरे में चेहरे,
और, तब मुझे प्रतीत हुआ भयानक
गहन मृतात्माएँ इसी नगर की
हर रात जुलूस में चलतीं,
परंतु, दिन में
बैठती हैं मिलकर करती हुई षड्यंत्र
विभिन्न दफ़्तरों-कार्यालयों, केंद्रों में, घरों में।
हाय, हाय! मैंने उन्हें देख लिया नंगा,
इसकी मुझे और सज़ा मिलेगी।
तो गजानन माधव मुक्तिबोध की यह कविता कल भी प्रासंगिक थी और आज भी प्रासंगिक है। कल भी सवालों के घेरे में वही सब थे, जो आज भी हैं। और मध्य प्रदेश के वर्तमान संदर्भ में भी कविता की यह पंक्ति कमाल दिखा रही है। वर्तमान में मध्य प्रदेश में अँधेरे मनों को यदि रोशनी की कहीं उम्मीद नजर आती होगी, तो वह यही सोचते होंगे कि कहाँ जाऊँ, दिल्ली या उज्जैन… अपनी कविता में मुक्तिबोध इस पंक्ति का भी
सृजन इसलिए कर पाए क्योंकि उनका उज्जैन से गहरा नाता था। उज्जैन में उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई थी। इसलिए उनके अवचेतन मन में उज्जैन हमेशा
स्थाई रूप से अंकित था।

कौशल किशोर चतुर्वेदी

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।

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