इंदौर में सड़क चौड़ीकरण पर मुआवजे का विवाद: आशियाने तोड़ने के एवज में सिर्फ टीडीआर-एफएआर, जबकि IDA, मेट्रो और NHAI देते हैं नकद मुआवजा; निगम से समान नीति की मांग

इंदौर में सड़क चौड़ीकरण के लिए लोगों के आशियाने तोड़ने के एवज में टीडीआर और एफएआर सर्टिफिकेट दिए जा रहे हैं, जबकि इन इलाकों में कई लोग हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वे दोबारा अपने घर बनवा सकें। हद यह है कि इंदौर शहर में ही अलग–अलग एजेंसियां के लिए मुआवजे के नियम बिल्कुल अलग हैं।

शंकरगंज में लोग तय सीमा से अधिक हिस्सा तोड़ने की शिकायत कर रहे हैं।

आईडीए जमीन अधिग्रहण अधिनियम के तहत मुआवजा देता है, मेट्रो व नेशनल हाईवे अथॉरिटी में भी मुआवजे का प्रावधान है, लेकिन नगर निगम सिर्फ टीडीआर सर्टिफिकेट देता है। 15 वर्षों में सिर्फ 3 टीडीआर सर्टिफिकेट बिक पाए हैं और वे भी जमीन कीमत से बहुत कम पर। पिछले दिनों निगम की बैठक में भी यह मुद्दा उठा था कि जिन कार्यों में मुआवजा नहीं देना होता है वे निगम के हवाले कर दिए जाते हैं। ने अलग–अलग एजेंसियों के अलावा पड़ौसी राज्यों के मुआवजा नियमों का तुलनात्मक अध्ययन किया तो कई चौंकाने वाली बातें सामने आईं।

छावनी, शंकरगंज, गणेशगंज, बियाबानी को न्याय की आसवेस्टर्न बायपास, ग्रीन फील्ड फोरलेन, कृष्णपुरा छत्री पार्किंग को भी मिला मुआवजा

  • इंदौर वेस्टर्न बायपास के लिए एनएचएआई ने मुआवजे की राशि 600 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 1000 करोड़ की।
  • इंदौर मेट्रो ने कृष्णपुरा छत्री पार्किंग के लिए 1.93 करोड़ रु दिए।
  • इंदौर-उज्जैन ग्रीन फील्ड फोरलेन के लिए 626 करोड़ का मुआवजा प्रस्तावित

अन्य राज्यों में – महाराष्ट्र में कटराज–कोंढवा रोड चौड़ीकरण के लिए लोग टीडीआर लेने को तैयार नहीं हुए तो नकद मुआवजा मंजूर किया। नागपुर में रोड में आ रही 650 संपत्तियों के लिए 331 करोड़ का मुआवजा दिया गया।

-अजय बागड़िया, वरिष्ठ अभिभाषक, इंदौर हाई कोर्टजनता को राहत देने कानून क्यों नहीं बदल सकते

यह ठीक है कि सुप्रीम कोर्ट ने इंदौर के ही एक मामले में यह स्वीकार किया था कि नगर निगम सड़क चौड़ीकरण के लिए जमीन ले सकती है और उसमें मुआवजे के रूप में टीडीआर, एफएआर दिया जा सकता है। कानूनी तौर पर इसमें कोई अड़चन नहीं है। सवाल इस बात का है कि अलग–अलग एजेंसियों के लिए मुआवजे के अलग–अलग नियम क्यों होना चाहिए? कम से कम सभी के समान नियम तो हो ही सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण यदि नियमों से जनता का अहित हो रहा है तो फिर उसे बदलने में क्या दिक्कत है। यदि कोई शहर हित में अपनी जमीन दे रहा है तो उसे कम से कम समुचित राहत तो मिले।

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