
राखी से पहले ‘चीनी कम’ जैसे हाल…एथेनॉल पर फिर सवाल…
भारत के एक प्रमुख त्योहार रक्षाबंधन यानि राखी के पहले बन रहे ‘चीनी कम’ जैसे हाल ने एक बार फिर पूरे देश में हलचल पैदा कर दी है। सबसे बड़ी बात यह है कि चीनी के महंगे होने के साथ ही एक बार फिर एथेनॉल सवालों के घेरों में है। और केंद्र सरकार को विपक्ष के आरोपों का जवाब देने के लिए सफाई पेश करनी पड़ रही है। कहीं न कहीं यह पूरा परिदृश्य एक बार फिर केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के इर्द-गिर्द केंद्रित नजर आ रहा है। एथेनॉल पर ईंधन के रूप में गाड़ियों को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ चीनी के मुख्य आधार गन्ना के उपयोग को प्रभावित करने के गंभीर आरोप लगना शायद ठीक नहीं है।
यह बात सामने आ रही है कि चीनी पिछले 3 महीने में 40% महंगी हो गई है। सरकार यहाँ चीनी के दामों को 56 रुपये प्रति किलोग्राम तक बता रही है तो आंकड़ा यह भी है कि भारत के कई हिस्सों में शहरों में इसकी कीमत 70 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है।
और विपक्ष ने मोदी सरकार को चीनी के नाम पर कठघरे में खड़ा करना शुरू कर दिया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने चीनी की बढ़ती कीमतों और स्टॉक पर सरकार से पूछा कि ये कैसा आत्मनिर्भर भारत है, जहां विदेश से चीनी आयात की जा रही है और दूसरी तरफ गन्ने को पेट्रोल में मिलाने के लिए एथेनॉल में झोंका जा रहा है। हालांकि, केंद्र सरकार इससे पहले ही चीनी की बढ़ती कीमतों के लिए एथेनॉल उत्पादन को जिम्मेदार मानने से इनकार कर चुकी है। कीमत कम करने के लिए केंद्र ने 31 अक्टूबर तक 10 लाख टन कच्ची चीनी बिना ड्यूटी के आयात करने की मंजूरी दी है।
नेशनल फेडरेशन ऑफ को-ऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज लिमिटेड सफाई दे रही है कि पिछले साल ज्यादा बारिश से गन्ने ‘की फसल को नुकसान हुआ। इससे गन्ने से चीनी बनने की दर यानी रिकवरी रेट 12% से नीचे आ गया। ‘चीनी कम’ की अन्य वजहों में सरकार की नई एथेनॉल ब्लेंडिंग पॉलिसी के तहत गन्ने का एक बड़ा हिस्सा चीनी की बजाय एथेनॉल बनाने में खप रहा है। तो एक वजह यह भी कि सरकार ने कीमतें बढ़ने पर मई 2026 में चीनी के निर्यात पर रोक लगाई, लेकिन तब तक 8 लाख टन चीनी देश से बाहर भेजी जा चुकी थी। और त्योहारी सीजन के दौरान जमाखोरी को भी ‘चीनी कम’ की एक वजह माना जा रहा है।
हालांकि केंद्र सरकार चीनी को लेकर किसी भी तरह के संकट से इंकार कर रही है और समुचित उपाय करने का दावा कर रही है। फिर भी, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि एथेनॉल एक बार फिर चर्चा में आ गया है। और कहीं न कहीं इसके चलते केंद्र सरकार को सफाई देनी पड़ रही है। यह बात तय है कि त्योहारों के समय चीनी के महंगे होने से आम आदमी का परेशान होना स्वाभाविक है। और इससे सरकार की साख पर आंच आना भी स्वाभाविक ही है। बात यहाँ चीनी संकट की नहीं है, बल्कि बात यह है कि एथेनॉल को लेकर सरकार को ठोस रणनीति बनानी ही पड़ेगी, वरना सवाल उठते रहेंगे और केंद्र सरकार बैकफुट पर नजर आती रहेगी। फिलहाल, तो यही कहा जा सकता है कि राखी से पहले ‘चीनी कम’ जैसे हाल…एथेनॉल पर फिर सवाल…।

कौशल किशोर चतुर्वेदी
कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।