नेहा मारव्या के दर्द की आखिर क्या दवा है… कौशल किशोर चतुर्वेदी

नेहा मारव्या के दर्द की आखिर क्या दवा है…
मध्य प्रदेश आईएएस कैडर की 2011 बैच की अफसर नेहा मारव्या का दर्द यह है कि एक साल में 4 बार
तबादला कर आखिर सरकार उनके साथ क्या सलूक करना चाहती है। आईएएस ऑफिसर्स के ग्रुप में एक बड़ा सा संदेश लिखकर उन्होंने अपना दर्द साझा किया। साथ ही आईएएस ऑफिसर्स एसोसिएशन की भूमिका पर भी सवालिया निशान लगा दिया। नेहा का कहना है कि आईएएस ऑफिसर्स एसोसिएशन क्या जन्मदिन की शुभकामनाएं देने के लिए ही गठित हुआ है? नेहा मारव्या ने शायद यह सोचकर एक बार फिर इतना लम्बा मैसेज ग्रुप पर पोस्ट किया है कि सरकार की जानकारी में आने पर उन्हें न्याय मिल सके। जब उन्हें सरकार ने चौदह साल तक कलेक्टर ने बनाया था, तब भी उन्होंने अपना दर्द इस ग्रुप पर बयां किया था और संयोग की बात है कि उसके बाद उन्हें डिंडोरी की कलेक्टरी मिल भी गई थी लेकिन वहां भी आठ महीने में ही उन्हें हटा दिया गया था। नेताओं की शिकायत पर हटाया जाना फिर भी सहन किया जा सकता है, लेकिन अब तो विभागीय कर्मचारियों द्वारा बहिष्कार करने पर आईएएस अफसर को हटाया जाना नेहा के लिए बहुत ही कष्टदायक है। यही कहा जा सकता है कि शायद नेहा की अग्निपरीक्षा ही हो रही है।
नेहा मारव्या ने आईएएस ग्रुप में लिखा कि एक साल में यह चौथा ट्रांसफर है और शिकायतों पर कार्रवाई की जगह उनका ही तबादला किया गया। 5 सितंबर 2026 की तबादला सूची में नाम आने के बाद नेहा ने लिखा-पिछले एक साल में यह चौथी बार है, जब उनका नाम ट्रांसफर लिस्ट में आया है। उन्होंने कहा कि इस बार वह खुद को बेहद हतोत्साहित महसूस कर रही हैं। नेहा ने अपने संदेश में कहा कि वह समझती हैं कि आईएएस अधिकारी होने के नाते राज्य सरकार उन्हें जहां चाहे, वहां पदस्थ कर सकती है। उन्होंने अब तक सरकार के आदेशों का सम्मानपूर्वक पालन किया है। हालांकि, इस बार उनका कहना है कि मामला अलग है। उन्होंने आरोप लगाया कि विभाग के कुछ कर्मचारियों ने उनके खिलाफ विद्रोह जैसा माहौल बनाया। उनके मुताबिक, कर्मचारियों ने मेज थपथपाकर उन्हें ट्रांसफर कराने की धमकी तक दी। नेहा ने दावा किया कि उन्होंने अनुशासनहीनता, फाइलें रोके जाने और दुर्व्यवहार की शिकायत उचित माध्यम से की थी। उन्हें उम्मीद थी कि मामले में कार्रवाई होगी। लेकिन, उनके मुताबिक, कार्रवाई की जगह उनका ही तबादला कर दिया गया।
5 सितंबर को नेहा मारव्या को एमडी,अनुसूचित जनजाति वित्त एवं विकास निगम बनाया गया है। साथ ही उन्हें अपर सचिव, मध्यप्रदेश शासन के समकक्ष पद घोषित किया गया है। इससे पहले उनके पास आदिम जाति क्षेत्रीय विकास योजनाओं के संचालक,
मैपसेट के प्रबंध संचालक, अनुसूचित जनजाति वित्त एवं विकास निगम के प्रबंध संचालक और आदिम जाति अनुसंधान एवं विकास संस्थान के संचालक का अतिरिक्त प्रभार था।
नेहा मारव्या का नेह हमेशा ही विवादों से रहा है। 2017 में शिवपुरी जिला पंचायत सीईओ रहते हुए तत्कालीन कलेक्टर ओपी श्रीवास्तव के साथ उनके मतभेद की खबर सामने आई थी।
दरअसल, नेहा ने कलेक्टर के इस्तेमाल में आ रही किराए की सफारी के भुगतान को लेकर आपत्ति जताई थी।
निर्धारित दर से अधिक भुगतान का हवाला देते हुए उन्होंने बिल रोक दिया था। राजस्व विभाग में पदस्थापना के दौरान तत्कालीन प्रमुख सचिव मनीष रस्तोगी के साथ भी उनके मतभेद की खबरें सामने आई थीं। नेहा ने आरोप लगाया था कि पदभार ग्रहण करने पहुंचने पर उन्हें कार्यालय में प्रवेश नहीं दिया गया और बाहर जाने को कहा गया। यह मामला भी उस समय चर्चा में रहा था। जनवरी 2025 में नेहा मारव्या को पहली बार कलेक्टर की फील्ड पोस्टिंग मिली थी। करीब 14 साल की सेवा के बाद उन्हें डिंडौरी कलेक्टर बनाया गया। उनका कार्यकाल 29 जनवरी 2025 से 2 अक्टूबर 2025 तक रहा। यानी करीब आठ महीने बाद ही उन्हें कलेक्टर पद से हटा दिया गया।
डिंडौरी में भी उनकी कार्यशैली को लेकर विवाद सामने आए थे। अगस्त 2025 में भाजपा विधायक ओमप्रकाश धुर्वे ने कलेक्टर पर गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने मुख्यमंत्री से शिकायत करने की बात कही थी। डिंडौरी के बाद नेहा को आदिम जाति क्षेत्रीय विकास योजनाओं का संचालक बनाया गया।
यहां भी उनके काम करने के तरीके को लेकर विवाद की खबरें सामने आईं।
योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर उनके और तत्कालीन प्रमुख सचिव गुलशन बामरा के बीच मतभेद की स्थिति बनी। इसके बाद कर्मचारियों की ओर से भी उनके खिलाफ मोर्चा खोले जाने की बात सामने आई। मामला मुख्यमंत्री तक पहुंचने की खबरें भी आईं।
दरअसल नेहा मारव्या की पटरी न तो अपने सीनियर आईएएस अफसरों से बैठ रही है और न ही अपने मातहत अधिकारियों-कर्मचारियों से। अब सरकार करे भी तो क्या करे? जिले में कलेक्टर बनाया तो भाजपा विधायकों से पटरी बैठा पाना उनके लिए संभव नहीं है। अब नेताओं से पटरी तो बहुत सारे कलेक्टरों की नहीं बैठती है, लेकिन तब भी नेता कलेक्टरों का तबादला आसानी से नहीं करा पाते। नेहा पर तो ऐसा लग रहा है कि सभी का आक्रोश एक जैसा ही भारी पड़ रहा है। नेहा ने सवाल उठाया कि क्या कोई आईएएस अधिकारी इतना असुरक्षित हो सकता है कि अधीनस्थ कर्मचारियों के विरोध के कारण उसका तबादला हो जाए? अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि नेहा मारव्या के दर्द की दवा क्या है… दर्द तो उन प्रमोटी आईएएस अफसरों का भी बहुत ज्यादा है जिन्हें आईएएस अवार्ड होने के बाद कलेक्टरी ही नहीं मिल पा रही है, जबकि वह सबसे पटरी बैठाने में
पूरी तरह से काबिल है… खैर, सरकार अगर ऐसे दर्द में डूबने लगे तब तो कोई काम करना ही बहुत मुश्किल हो जाए, इसलिए अपने-अपने दर्द की दवा खुद ही ढूंढना पड़ेगी।

कौशल किशोर चतुर्वेदी

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।

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