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मौत परिवार के लिए मातम लाती है, लेकिन उज्जैन में जालसाजों ने इसे ‘कमाई का जरिया’ बना लिया। आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (ईओडब्ल्यू) ने ऐसा घोटाला उजागर किया, जिसमें मुर्दों के नाम पर बीमा पॉलिसी लेकर करोड़ों के क्लेम हड़पने की कोशिश की गई

इस ‘डेथ स्कैम’ में एजेंट, सरपंच, सचिव और सरकारी कर्मचारी शामिल थे। डेढ़ साल की जांच के बाद EOW ने 43 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की। करीब 8 करोड़ रुपए के फर्जी बीमा क्लेम घोटाले का खुलासा हुआ है।

केस1: पॉलिसी लेने से 64 दिन पहले मौत
आलाखेड़ा उज्जैन के बालूसिंह के नाम पर पॉलिसी उसकी मौत के 64 दिन बाद ली गई। गांव में पता चला कि बाबूसिंह का पहले डेथ सर्टिफिकेट बन चुका था। पॉलिसी के लिए नया सर्टिफिकेट बनाकर 35 लाख का क्लेम लेने की कोशिश की गई।
ऐसा ही मामला धुरेड़ी के धर्मेंद्र चौहान का था। उसकी मौत के 30 दिन बाद पॉलिसी ली गई और 30 लाख का क्लेम किया गया।
केस2: फर्जी डेथ सर्टिफिकेट लगाया
उज्जैन के घट्टिया तहसील की जयकुंवर की पॉलिसी के 28 दिन पहले ही मौत हो चुकी थी। उनका डेथ सर्टिफिकेट बनवाकर क्लेम में लगाया गया। 25 लाख रुपए क्लेम लेने की कोशिश की गई। पंवासा के दिनेश मालवीय की पॉलिसी के 21 दिन पहले मौत हो चुकी थी। उसका डेथ सर्टिफिकेट उज्जैन नगर निगम से बताया गया।
जांच में पता चला कि वहां से सर्टिफिकेट जारी नहीं हुआ था। एजेंट और परिजनों ने फर्जी सर्टिफिकेट लगाकर 30 लाख का क्लेम किया।

केस 3: मौत से 24 घंटे पहले पॉलिसी
यह मामला उज्जैन जिले के गोवर्धन सिंह का था। ईओडब्ल्यू ने केस फाइल में पाया कि उन्हें कागजों में स्वस्थ दिखाया गया था। जांच में पता चला कि उनका एक प्राइवेट अस्पताल में इलाज चल रहा था। अस्पताल रिकॉर्ड में सामने आया कि उन्हें लिवर में गंभीर इन्फेक्शन था। उनकी मौत से 24 घंटे पहले बीमा कराया गया था।
केस 4: मजदूर की 15 लाख की पॉलिसी
यह मामला भी उज्जैन का था। मुकेश जुझारे मजदूर था। उसके नाम से दो पॉलिसी थीं। एक पॉलिसी मौत से 3 दिन पहले ली गई थी, जिसमें उसे पूरी तरह स्वस्थ बताया गया था। इसकी पहली किस्त 70 हजार रुपए थी। किस्त भरने के तीन दिन बाद मुकेश की मौत हो गई। परिवार ने इंश्योरेंस कंपनी से 15 लाख का क्लेम लेने के लिए केस फाइल किया।

गिरोह के किरदार: किसका क्या था काम?
- मास्टरमाइंड (एजेंट): मेघा डोंगारवर, ऋषि पाल और प्रहलाद पाटीदार समेत करीब 14 एजेंटों ने ऐसे लोगों को चुना जो मर चुके थे या मरने वाले थे। उन्होंने परिजनों को लालच दिया कि “पॉलिसी ले लो, जो पैसा आएगा आधा-आधा बांट लेंगे।”
- मददगार (सरपंच-सचिव): जसवंत सिंह (सरपंच), राजकुमार देवड़ा (सचिव) जैसे अधिकारियों ने लालच में बैक डेट में डेथ सर्टिफिकेट जारी किए और रजिस्टर में हेरफेर की।
- हितग्राही (परिजन): करीब 22 परिजनों ने जानते हुए भी कि यह धोखाधड़ी है, दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए और क्लेम राशि में हिस्सा लिया।
बैंक अधिकारियों की भूमिका पर सवाल
EOW की जांच में सवाल उठा कि क्या बैंक अधिकारियों की मिलीभगत के बिना यह संभव था? नई पॉलिसी को वेरिफाई करना उनका काम है। क्या वे टारगेट के दबाव में चूक गए या इस ‘मौत के खेल’ में साझीदार थे? फिलहाल एफआईआर में एजेंटों के नाम हैं, अधिकारियों की भूमिका की जांच जारी है
